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लद्दाख में चुनाव बहिष्कार पर सभी संगठन व दल एक हुए, पढ़िये क्या हैं मांगें

लेह। लद्दाख में चुनाव बहिष्कार पर सभी राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक संगठन और पार्टी एक साथ आ गए हैं और चुनाव का बहिष्कार का ऐलान कर दिया है। केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में अक्तूबर में लद्दाख ऑटोनॉमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल (LAHDC यानी लद्दाख स्वायत्त पर्वत विकास परिषद) के चुनाव होंगे। 05 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर का विशेष संवैधानिक दर्जा समाप्त कर उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया था, उसके बाद से ये पहले चुनाव हैं। ये संगठन लद्दाख के लिए संविधान में अधिक सुरक्षा चाहते हैं।

संगठनों के इस फ़ैसले की घोषणा मंगलवार को लेह में हुई एक प्रेसवार्ता में की गई है। बयान में कहा गया है ‘लद्दाख के लिए छठवीं अनुसूची के लिए जन अभियान के नेतृत्व ने तब तक LAHDC के चुनावों का बहिष्कार करने का फ़ैसला किया है। जब तक लद्दाख को संविधान की छठवीं अनुसूची में शामिल न कर लिया जाए। लद्दाख और उसके लोगों को भी बोडो क्षेत्रीय परिषद की तरह दर्जा दिया जाना चाहिए।’

लद्दाख में चुनाव बहिष्कार के साझा बयान पर 12 लोगों के हस्ताक्षर

लद्दाख में चुनाव बहिष्कार करने के लिए जो साझा बयान जारी किया गया है उस पर 12 लोगों के हस्ताक्षर हैं। जिनमें बीजेपी के ज़िलाध्यक्ष, आम आदमी पार्टी के संयोजक, कांग्रेस के नवान रिगज़िन जोरा और दूसरे धार्मिक समूहों के नेताओं के नाम भी शामिल हैं।

इस साझा बयान ने लेह के लोगों की एकजुटता तो दिखाई है लेकिन इसमें करगिल का कोई ज़िक्र नहीं है। बीते साल अगस्त में केंद्र शासित प्रदेश के बनने के बाद लद्दाख के लेह में जश्न मनाया गया था लेकिन रोज़गार छिनने और क्षेत्र की आबादी में बदलाव को लेकर आशंकाएं भी ज़ाहिर की गई थीं।

“हमारे यहां आबादी सिर्फ़ तीन लाख है और मीलों दूर तक ख़ाली ज़मीनें हैं, ऐसे में बाहरी लोग यहां आकर बस सकते हैं। इसीलिए हम चिंतित हैं। समय के साथ लोग लद्दाख की ओर पलायन शुरू कर देंगे और हम यहां अल्पसंख्यक बनकर रह जाएंगे।” – (चेरिंग डोरजे,पूर्व भाजपा प्रमुख, लद्दाख)

बीते महीने लेह के सभी प्रमुख नेता एक साथ आए थे और तब से ही लद्दाख के लिए संविधान में विशेष दर्जे की माँग ज़ोर पकड़ रही है। इस समूह में लद्दाख बौद्ध एसोसिएशन, शिया और सुन्नी एसोसिएशन और कुछ पूर्व नेता भी शामिल हैं।

जब लद्दाख में संवैधानिक सुरक्षा की माँग ज़ोर पकड़ने लगी तो मौजूदा पर्वत परिषद, जिसमें अभी बीजेपी बहुमत में है, ने भी इसी माँग के समर्थन में प्रस्ताव पारित कर दिया।

क्या कहना है लद्दाख के नेताओं का

भारतीय जनता पार्टी के नेता और LAHDC के डिप्टी चेयरमैन सेरिंग सामदूप कहते हैं, “लद्दाख के लोगों की जनइच्छाओं को देखते हुए मैं ये प्रस्ताव पेश करता हूँ कि लद्दाख के लोगों को अपनी ज़मीन, जंगल, रोज़गार, व्यापार, सांस्कृतिक संसाधनों और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए संविधान में विशेषाधिकार दिए जाएँ। लद्दाख के मूल निवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए ये संविधान की छठी अनुसूची या अनुच्छेद 371 या फिर संविधान के डोमिसाइल एक्ट के ज़रिए दिया जा सकता है।”

इस प्रस्ताव की लद्दाख के कई राजनीतिक हल्क़ों में आलोचना हुई है। चेरिंग डोरजे कहते हैं, “हमने पर्वत परिषद में लाए गए प्रस्ताव के बारे में लेह के चीफ़ एक्ज़ीयक्यूटिव काउंसलर को एक पत्र लिखा है। आप एक साथ तीन चीज़ें नहीं माँग सकते, आपको ठोस तरीक़े से एक ही माँग रखनी होगी। आपको ये स्पष्ट करना होगा कि बीजेपी क्या चाहती है।”

जम्मू-कश्मीर से अलग करने के बाद लद्दाख पर क्या प्रभाव पड़ा

05 अगस्त 2019 को जब जम्मू-कश्मीर का विशेषाधिकार समाप्त किया गया था, तब लद्दाख को उससे अलग कर दिया गया था। उस समय बीजेपी ने कहा था कि अब लद्दाख भी बाक़ी भारत से मिल जाएगा। लेकिन अब लद्दाख में चुनाव बहिष्कार और विशेष दर्जे की माँग बीजेपी के उसी नज़रिए को चुनौती देती प्रतीत होती है।

बीजेपी के कार्यकर्ता भी बहिष्कार का पक्ष ले रहे हैं। बीजेपी हाईकमांड और कार्यकर्ताओं के बीच दरार अब सामने आ रही है। बुधवार को बीजेपी के राम माधव और अशोक कौल लेह पहुंचे और कार्यकर्ताओं के साथ कई मीटिंग की, हालांकि समस्या का फ़िलहाल समाधान होता नहीं दिख रहा। गुरुवार को लेह में बीजेपी के काउंसलर सेरिंग वांगडस ने पार्टी की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया।

“ये बहुत पीड़ा के साथ कर रहा हूं क्योंकि लेह की बीजेपी इकाई में बाहरी ताक़तों का हस्तक्षेप बहुत बढ़ गया है। पार्टी में एक पल के लिए किसी भी पद पर बने रहना लद्दाख और लोगों की आवाज़ के ख़िलाफ़ होगा।” – सेरिंग वांगडस (भाजपा के काउंसलर)

अनुच्छेद 370 को लेकर क्या कहते है स्थानीय लोग

उच्चस्तरीय कमेटी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखकर इस ओर ध्यान देने की बात कही है। अनुच्छेद 370 और 35 ए जम्मू-कश्मीर में संपत्ति और नौकरियों को स्थानीय लोगों के लिए सुरक्षित करते थे। नौकरियों में सुरक्षा को और बढ़ाने के लिए जम्मू-कश्मीर की सरकार डोमीसाइल नीति भी लेकर आई थी। 

चेरिंग डोरजे कहते हैं कि बीजेपी को अपने कार्यकर्ताओं को लेह के लए छठवीं अनुसूची का समर्थन करने से नहीं रोकना चाहिए. वो कहते हैं, “अगर आपको इतना बड़ा देश चलाना है तो लोगों की स्थानीय भावनाओं का ध्यान रखना होगा और बीजेपी वो नहीं कर पा रही है और इसकी क़ीमत उसे चुकानी पड़ेगी।”

नामग्याल वांगचुक दिल्ली में एक ट्रैवल कंपनी में काम करते थे लेकिन कोविड महामारी की वजह से इन दिनों लेह में ही रह रहे हैं। वो कहते हैं, “केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद मैंने सबसे बड़ा बदलाव ये देखा है कि अब लद्दाख के विकास के लिए अधिक फ़ंड मिल रहा है और यहां ढांचागत सुविधाओं में सुधार हो रहा है।”

“हमारे लिए नौकरियां ख़त्म हो रही हैं। अब हमारे लिए कोई आरक्षण नहीं है, जो हमें अनुच्छेद 370 के समय मिलता था। लद्दाखी लोगों के मन में अब केंद्र शासित प्रदेश को लेकर आशंकाएं पैदा हो रही हैं। क्योंकि न ही हमें छठवीं अनुसूची मिली है और ना ही विधानसभा मिली है।” – नामग्याल वांगचुक, स्थानीय निवासी

लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद से पैदा हुआ संकट

LAHDC एक निर्वाचित संस्था है जिसमें तीस सदस्य होते हैं। इनमें से 26 चुने जाते हैं जबकि चार को नामित किया जाता है। मौजूदा LAHDC में बीजेपी के बीस और कांग्रेस के छह सदस्य हैं। ये काउंसिल साल 1995 में बनी थी. तब से ही लेह और कारगिल में विकास कार्य यही करा रही है. दोनों ही ज़िलों की अपनी अलग-अलग काउंसिल हैं। जब से लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश बना है, प्रशासन और LAHDC के बीच कई मौक़ों पर विवाद हुआ है।

यह भी पढ़ें – प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक कश्मीरी “पत्थरबाज” की तारीफ क्यूँ की?

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