Homeमजबूर भारतअसम चुनाव और रोज़गार का वादा: चुनावी घोषणा के बरअक्स सच्चाई

असम चुनाव और रोज़गार का वादा: चुनावी घोषणा के बरअक्स सच्चाई

असम। बंगाल में चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 75 लाख रोज़गार का वादा किया। इससे पहले वर्ष 2016 में बंगाल के पड़ोसी राज्य असम में भी चुनाव प्रचार के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने 25 लाख नौकरियाँ देने का वादा किया था। आइये देखते हैं, असम में रोज़गार का वादा कितना पूरा हुआ।

रोज़गार का वादा हकीकत न बन सका

आउटलुक की रिपोर्ट के अनुसार साढ़े चार वर्षों में भाजपा सरकार ने महज़ 80 हज़ार नौकरियाँ ही उपलब्ध करवाईँ। यह भाजपा द्वारा किये गये वादे का महज 3.2 प्रतिशत है, इसमें नियमित भर्ती व संविदा नियुक्ति द्वारा भरे गए पद दोनों ही शामिल हैं। असम चुनाव में कांग्रेस उसके अंतर्गत अन्य संगठनों विशेषकर एनएसयूआई ज़ोर-शोर से इस मुद्दे को उठाने में जुटी है।

असम में सीएए के अलावा रोज़गार एक बड़ा मुद्दा है। 31 दिसंबर 2019 की स्थिति में असम राज्य में बेरोज़गारों की संख्या 17 लाख थी। उल्लेखनीय है कि यह आंकड़े कोविड का प्रकोप शुरू होने से पहले के हैं। कुल मिलाकर 20 लाख से अधिक लोगों ने असम में रोज़गार कार्यालय में पंजीयन करवाया था। यह आंकड़े आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण 2018-19 के हैं। यह सर्वेक्षण कहता है कि असम का हर छठा स्नातक और हर दसवां स्नातकोत्तर युवा बेरोज़गार है। दुर्घटना से होने वाली मौतों और आत्महत्या के आंकड़ों के अध्ययन से यह पता चला है कि 2019 में असम के अंदर 791 युवाओं ने बेरोज़गारी की वजह से आत्महत्या की।

मुद्रा लोन से भी अपेक्षित सफलता हासिल नहीं है

असम के राज्यपाल जगदीश मुखी का दावा है कि विभिन्न औद्योगिक इकाईयों को 1800 करोड़ रूपये का ऋण दिया गया। यह ऋण आत्मनिर्भर भारत के तहत इसलिये दिया गया ताकि वे कोविड-19 संकट से उबर सकें। mudra.org.in की रिपोर्ट के अनुसार शिशु, किशोर व तरुण श्रेणी मिलाकर कुल मिलाकर मुद्रा योजना के तहत 16 लाख 68 हज़ार 347 लोगों को तकरीबन 7572 करोड़ रूपये का लोन दिया गया। इसे कैलकुलेट किया जाए तो प्रति व्यक्ति ऋण 45 हज़ार से थोड़ा ही ज्यादा है। इसमें भी सर्वाधिक संख्या शिशु लोन लेने वालों की है जिन्हें 50 हज़ार रुपये तक को लोन दिया जाता है। औसतन आवेदित लोगों के सापेक्ष 31647 रूपया शिशु लोन के रूप में दिया गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि वह उद्यमी अपने व्यापार को कितना संभाल पाएगा और कितनों को रोज़गार दे पाएगा।

मनरेगा के ज़रिये भी पर्याप्त रोज़गार नहीं

लगभग 57 लाख परिवारों और एक करोड़ श्रमिकों ने मनरेगा के तहत पंजीयन करवाया था। वित्तीय वर्ष 2020-21 में महज़ 58 हज़ार से थोड़े ही ज़्यादा परिवारों ने मनरेगा के तहत 100 दिन का रोज़गार प्राप्त किया था। जबकि व्यक्तिगत रूप से पंजीकृत एक करोड़ लोगों में से सिर्फ 34 लाख को ही काम मिला।

समग्र आँकड़े जितने लुभावने हैं, व्यक्तिगत स्तर पर उतने ही कड़वे। जब सरकार रोज़गार का वादा करती है तो इस वादे के साथ करोड़ों लोगों की उम्मीदें भी जुड़ जाती हैं। ऐसे में यदि कोई जीविकोपार्जन में असफल होता है तो निराशा स्वाभाविक है।

असम में नाकामयाबी के बावजूद पं. बंगाल में 75 लाख नौकरियों के वादे पर जनता कितना विश्वास करती है। यह भाजपा का अति-आत्मविश्वास है या मास्टरस्ट्रोक? इन सवालों के जवाब तो अब चुनाव परिणाम आने से ही पता चलेगा।

यह भी पढ़ें – खाली पड़े लाखों सरकारी नौकरियों पर मोदी सरकार ‘मौन सरकार’ बन चुकी है

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular News

Recent Comments

English Hindi