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महिलाओं में 55.8% की भयावह बेरोजगारी दर और 3.5% की चिंताजनक श्रम भागीदारी – अनुपम

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हाल ही में यह माना कि उन्होंने उद्योग लगाने कि कोशिश की लेकिन लगा नहीं पाए। वहीं राज्य के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी का यह कथन भी हास्यास्पद है कि अगर उन्हें मौका मिला तो बेरोज़गारी दूर करेंगे। ‘बोल बिहारी’ के तहत पेश किए गए चौंकाने वाले आँकड़ें इन बयानों के बाद और प्रासंगिक हो गए हैं।

राज्य में कुल 36 लाख 37 हज़ार बेरोज़गार होना बिहार के विकास पर धब्बा और बड़े प्रश्नचिन्ह की तरह हैं। 11.9% बेरोज़गारी दर के साथ बिहार की गिनती देश के सबसे पिछड़े राज्यों में है। इससे भी भयावह संकेत महिलाओं की बेरोज़गारी दर दे रही है जो 55.8% तक पहुँच चुकी है। महिलाओं में श्रम भागीदारी तो मात्र 3.5% है। सवाल ये है कि बिहार की महिलाओं को क्या रोज़गार का हक़ नहीं?

एक तरफ जहाँ बिहार के बेरोज़गार युवा नौकरी के लिए सड़कों पर लाठी डंडे खा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ चार लाख से ज़्यादा सरकारी पद खाली पड़े हैं। आज ये सवाल हर बिहारी को पूछना चाहिए कि सरकार इन रिक्त पदों को क्यों नहीं भर सकती।

रिक्त पदों का ब्यौरा देखा जाए तो स्वास्थ्य विभाग में ही तीन चौथाई पद खाली, जिनमें करीब 7800 डॉक्टर, 13800 नर्स और 1500 फार्मासिस्ट हैं।

कानून व्यवस्था के पैमानों पर बिहार की हालत देश में सबसे बुरी मानी जाती है। लेकिन देश में सबसे खराब नागरिक पुलिस अनुपात होने के बावजूद 50 हज़ार से ऊपर पुलिस विभाग में पद खाली हैं।

इतना ही नहीं, शिक्षा की दयनीय हालात के बावजूद देश में सबसे ज़्यादा 2,75,255 शिक्षकों के पद बिहार में ही खाली हैं।

युवाओं को रोज़गार देने में नाकाम बिहार सरकार को घेरते हुए ‘युवा हल्ला बोल’ के राष्ट्रीय संयोजक अनुपम ने कहा, “बेरोज़गारी देश का सबसे गंभीर मुद्दा है जिसपर युवाओं में भारी आक्रोश है। आज बिहार इस आक्रोश की राजधानी बन गयी है। सरकार की इस विफलता पर चुनाव के दौरान समीक्षा होनी चाहिए। प्रत्याशियों से भी रोज़गार के मुद्दे पर सवाल पूछे जाने चाहिए। ‘युवा हल्ला बोल’ की टीम ‘बोल बिहारी’ मुहिम के दौरान आम जनता से रोज़गार पर सकारात्मक संवाद कर रही है।”

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