Home भारत की रिपोर्ट - तहखाना पचास हज़ार रोजगार के चक्कर में कश्मीर के पत्रकार हुए बेरोजगार

पचास हज़ार रोजगार के चक्कर में कश्मीर के पत्रकार हुए बेरोजगार

  • 5 अगस्त 2019
  • संसद में एक कार्यवाही के बाद जम्मू और कश्मीर में लगा धरा 370 हटा दिया जाता है.
  • नेट बंद, पूरे प्रदेश में धारा 114, फोन कनेक्शन बंद, लोग घरों में कैद.
  • इस दौरान भारत सरकार और वहां के गवर्नर ने अपना पक्ष रखा.
  • पक्ष में यह कहा गया की इससे जम्मू और कश्मीर को बेरोजगारी से आज़ादी मिलेगी. 
  • लेकिन कश्मीर को बेरोजगारी से कितनी आज़ादी मिली. यह खुद वहां के पत्रकारों ने बताया.

‘मैं पहले Free Press Kashmir में काम करती थी लेकिन नेट बंद होने की वजह से वो अब बंद हो गया.’ – Zeenish

‘अब बेरोजगार बैठा हूँ. मैं Free Press Kashmir चलाता था. लेकिन नेट बंद होने की वजह से बंद करना पड़ा. इससे करीब 35 लोग बेरोजगार हो गए. ‘Zaid, Editor In Chief FPK

‘कश्मीर में पहले ही इकॉनमी को 18 हज़ार करोड़ का नुकसान हुआ है. सबसे ज्यादा नौकरियां पत्रकारों की गयी है. ऐसे बहुत से पोर्टल हैं जो अब बंद हो गए हैं.’ – Marila, Earlier with Kashmirwala

‘सरकार के तरफ से Media Centre का प्रावधान है. लेकिन वहां बारी कब आए ये नहीं पता होता. फाइल भी ट्रांसफर नहीं होती. ऑफिशियली तो नहीं लेकिन unofficially मेरे जानने वाले पत्रकारों व सरकारी कर्मचारियों को बता दिया गया की जब नेट बंद है तो काम हो नहीं सकता. तो इसलिए आपको निकला जा रहा है.’ – Irfan, Rising Kashmir

कश्मीर में अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद भारत सरकार और वहां के राज्यपाल के तरफ से सफाई दी गयी की इससे आने वाले दिनों में जम्मू और कश्मीर में क्या बदलाव होगा . उनमे से एक ‘बेरोजगारी खत्म’ की भी बात कही गयी थी. इसपर हमने कई पत्रकारों से बात की. बातचीत में पता चला की कश्मीर के पत्रकार ही बेरोज़गार हैं.

वरमुलपोस्ट की वेबसाइट बिक रही है !

वरमुलपोस्ट कश्मीर का पुराना वेब पोर्टल है. इसकी शुरुआत 2014 में की गयी थी. इसके मुख्य सम्पादक मुनीद हैं. मुनीद ने बताया की नेट बंद होने से हमारे पास सिर्फ इंतज़ार का ही चारा था. लेकिन जब कई महीन बीत जाने के बाद भी नेट नहीं चला तो हमे इसे बंद करना पड़ा. इनसे जब सवाल किया गया की, अब तो नेट चालु हो गया. तो क्या अब शुरू करेंगे तो उन्होंने जवाब दिया ‘फिलहाल मार्किट डाउन होने की वजह से अब कोई उपाय भी नहीं है. जिससे नयी शुरुआत की जा सके.’

हमने कई और पत्रकारों से बात की तो उन्होंने ने बताया की व्यवसाय शुरू किया जा सकता है. लेकिन उसके लिए फिरसे शुरुआत करनी होगी. मार्केट स्लो डाउन की वजह से कोई इन्वेस्टर भी नहीं मिल पा रहा है. इसलिए जब तक हालात थोड़े सही नहीं हो जाते तब तक यही किसी रोजगार में ही हाथ आजमाना पड़ रहा है.

बारामुला से मिडिया सेंटर जाने में 1-2 हज़ार का खर्चा हो जाता था, एक दिन में !

‘नेट बंद होने के बाद हमें हमारी संस्थान से कह दिया गया की जब नेट नहीं है तो आपका क्या काम है. शुरुआत दिनों में मैं बारामुल्ला से श्रीनगर स्थित मिडिया सेंटर जाता था. लेकि जितनी मेरी तनख्वा नहीं उससे ज्यादा खर्चा हो जाता था. फिर बाद में उन्होंने मुझे निकाल ही दिया.’ हाफिज ने बातचीत में यह बताया. आज कल हाफिज नौकरी की तलाश में हैं. हाफिज कहते हैं की पत्रकारिता के अलावा भी कहीं नौकरी मिल जाए तो मैं वो करने को तैयार हूँ.

ऐसा नहीं है की सरकार ने नेट बंद कर दिया तो मिडिया के लिए वहां को बंदोबस्त नहीं किए हैं. लेकिन जिस ‘मीडिया सेंटर’ को स्थापित किया गया. उसकी क्षमता बहुत कम है. मीडियाकर्मियों को उसके लिए नंबर लगाना पड़ता है. मिडिया के साथी बताते हैं की यह पता ही नहीं होता की बारी कब आएगी. साथ ही मिडिया सेंटरका नेट भी इतना कारगर नहीं होता की कोई फाइल झटपट शेयर हो जाए.

नौकरी जाने में सरकार का की बड़ी भूमिका है !

‘नेट बंद होने के बाद से स्टोरीज कम छपने लगी. प्रचार किसको दिया जाएगा और खबर भी किस लहज़े में छपेगी इसका भी दबाव पड़ने लगा. इस वजह से Rising kashmir का सर्कुलेशन भी कम हो गया और अब आधिकारिक तो नहीं लेकिन कई फोटो जर्नलिस्ट, फ्रीलांसर व न्यूज़ राइटर्स को निकाल दिया गया’ राइजिंग कश्मीर के इरफ़ान ने फोन पर बातचीत में बताया. इरफ़ान ने बताया की मीडिया सेंटर सिर्फ मजाक है. वहां कब बारी आए इसका अंदाजा भी नहीं होता. पहले करीब 300 से ज्यादा वेब पोर्टल हुआ करते थे. लेकिन अब गिने चुने ही बचे हैं. जिसकी वजह से पत्रकारिता से जुड़े लोग अब नए तलाश में जुट गए हैं.

हालाँकि 5 अगस्त के बाद तत्कालीन गवर्नर ने जम्मू और कश्मीर में रोजगार बढ़ाने का दावा किया था. लेकिन मौजूदा समय में हालत ये है की वहांके पत्रकार पत्थर तोड़ रहे हैं. फोटो जर्नलिस्ट मुनीब ने बताया कि पहले वो Kashmir Images और Quint के लिए काम करता था. लेकिन नेट बंद होने की वजह से मैं खींची हुई तस्वीर ट्रांसफर नहीं कर पाता. जिसकी वजह से मुझे नौकरी से हाथ गवाना पड़ा. इसलिए अब मजदूरी ही नया चारा है.

इस Report के लिए मैंने Kashmir Reader, The Kashmirwala, Rising Kashmir, Free Press Kashmir, Varmulpost; इन सभी से बात करने के पहले इनके फेसबुक पेज और वेबसइट को खंगाला और जानकारी इकट्ठी की.
फिर इनसे जुड़े पत्रकारों व इनके सम्पादकों से बात की. जिसमे Kashmir Reader, Free Press Kashmir
और Varmulpost बंद हो चुके हैं. जिनकी गिनती पुराने और बड़े वेब पोर्टल में होती है.

सरकार के दावे से नकारते हुए इन पत्रकारों ने यह भी कहा की जब पत्रकार ही बेरोजगार हैं व ज्यादातर वेब पोर्टल व अखबर बंद हो गए हैं. तो फिर कश्मीर में ‘रोजगार’ बढ़ा या उसके लिए क्या कदम उठाए गए, ये खबर छापे कौन ?

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