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भारतीय समाज में ज़हर घोलने वाले फेक और नफरती न्यूज़ के खिलाफ एक हुए सेना के रिटायर्ड अधिकारी

दिल्ली। फेक और नफरती न्यूज़ उस जहर का तरह हैं, जो बूंद भर हो लेकिन माहौल खराब करने के लिए काफी है। भारतीय सेना में तथाकथित मुस्लिम रेजिमेंट का झूठ ऐसा झूठ है, जो बरसों से सोशल मीडिया पर फैलाया जा रहा है। रह-रहकर इस तथाकथित मुस्लिम रेजिमेंट की फेक और नफरती न्यूज़ सोशल मीडिया पर वायरल होती है। इस बार सेना के करीब 120 रिटायर्ड अधिकारियों ने इस पर गंभीर चिंता जाहिर की है। कथित मुस्लिम रेजिमेंट का सच सेना के अधिकारियों ने बताया है।

फेक और नफरती न्यूज़ के विरोध में रिटायर्ड अधिकारियों ने लिखी राष्ट्रपति को चिट्ठी

भारतीय सेना से रिटायर हुए कई बड़े अधिकारियों ने इस बारे में राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखी है। इनमें नेवी के रिटायर्ड चीफ एल. रामदास सहित सेना के 24 टू स्टार और थ्री स्टार अधिकारी भी हैं। सोशल मीडिया पर फैली मुस्लिम रेजिमेंट की फेक न्यूज़ में दावा किया जाता है कि 1965 तक सेना में एक मुस्लिम ब्रिगेड थी, जिसने पाकिस्तान से युद्ध करने से मना कर दिया था।

सेना के रिटायर्ड अधिकारियों ने लिखा है कि ऐसी फेक न्यूज़ से सेना का मनोबल गिरता है और माहौल खराब होता है। चिट्ठी में टाइम्स ऑफ इंडिया में लेफ्टिनेंट जनरल एस.ए. हसनैन के लिखे एक ब्लॉग का हवाला भी दिया गया है। इसमें कहा गया था कि इस तरह के झूठ को फैलाने के पीछे पाकिस्तानी इंटेलिजेंस एजेंसी आईएसआई का हाथ भी हो सकता है।

राष्ट्रपति को भेजी चिट्ठी का मज़मून

हम यह बताना चाहते हैं कि भारतीय सेना की कई रेजिमेंट्स में मौजूद मुस्लिम सैनिक देश के लिए बहादुरी से लड़े हैं। बाकी सैनिकों के अलावा 1965 की लड़ाई में सम्मान पाने वालों में हवलदार अब्दुल हमीद (परमवीर चक्र), मेजर (बाद में ले. कर्नल) मोहम्मद जकी (वीर चक्र), मेजर अब्दुल राफे खान (वीर चक्र) शामिल हैं। इससे पहले भारत की आजादी के वक्त 1947 में बलूच रेजिमेंट के ब्रिगेडियर रहे मोहम्मद उस्मान ने कश्मीर में पाकिस्तान को घुसने से रोकने के लिए अपनी जान दे दी। वह 1948 में शहीद होने वाले सबसे सीनियर अधिकारी थे।

हम आपसे गुजारिश करते हैं कि फौरन राज्य सरकारों को निर्देश दें कि वह सोशल मीडिया पर इस तरह की फेक और नफरती न्यूज़ फैलाने वालों पर तत्काल और सख्ती से लगाम लगाएँ। इस तरह के पोस्ट आम जनमानस में मुस्लिम समुदाय के प्रति अविश्वास की भावना पैदा कर रहे हैं। जब वह मुस्लिम रेजिमेंट जैसी झूठी कहानियाँ सुनते हैं तो उन्हें लगता है कि जब सेना में मुस्लिमों पर भरोसा नहीं किया जा सकता तो आम जिंदगी में कैसे किया जाए।

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