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शिरोमणि अकाली दल के सुखबीर सिंह बादल के किस दावे की किसानों ने खोली पोल?

राजनीति में कब, कहाँ, कौन पलटी मार दे या क्या बयान दे दे, कोई विशेषज्ञ नहीं बात सकता। ऐसा ही कुछ किसान आंदोलन को भुनाने के लिए शिरोमणि अकाली दल (SAD) के प्रेसिडेंट सुखबीर सिंह बादल ने किया है।

शिरोमणि अकाली दल बीजेपी नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार की सहयोगी पार्टी है। जब कृषि अध्यादेश लाया गया था उस समय  तब शिरोमणि अकाली दल की हरसिमरत कौर केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्री थीं। कृषि कानून बनने के बाद जब किसानों की आपत्तियाँ आने लगी और किसान नाराज दिखाई दिए तब हरसिमरत कौर ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।

अब जब किसानों का आंदोलन जन-सामान्य का आंदोलन बनता जा रहा है तब राजनीतिक दल इसका श्रेय लेने और खुद को इस आंदोलन के साथ खड़ा बता रहे हैं।  

शिरोमणि अकाली दल (SAD) के प्रेसिडेंट सुखबीर सिंह बादल ने तो यह भी दावा कर दिया है कि किसान आंदोलन के दौरान जिन 54 लोगों की मौत हुई, उनमें से 40 अकाली दल के कार्यकर्ता थे।  फिर बारी किसानों की थी। किसानों ने सुखबीर के दावों की पोल खोल दी। किसान नेताओं ने कहा कि मरने वाले किसानों के अंतिम संस्कार में भी अकालियों को शामिल नहीं होने दिया गया था।

शिरोमणि अकाली दल (SAD) के प्रेसिडेंट सुखबीर सिंह बादल ने द इंडियन एक्सप्रेस अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा कि उनकी पार्टी के कार्यकर्ता कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे आंदोलन में सक्रिय हैं. उन्होंने कहा-

हमारे आम कार्यकर्ता दिल्ली के बॉर्डर पर डटे हुए हैं, कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। SAD वर्करों के रूप में नहीं बल्कि किसानों के रूप में, पार्टी के 65 चुनाव प्रभारी दिल्ली में हैं। हमारे कार्यकर्ताओं ने दिल्ली की सीमाओं पर एक तम्बू शहर बनाया है। उनमें से कई ब्लॉक और गांव स्तर पर पार्टी के पदाधिकारी हैं।

दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (DSGMC) ने नियमित रूप से किसानों के लिए लंगरों का आयोजन किया है, उनके रहने की व्यवस्था की गयी है। कमेटी के अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा SAD की कोर कमेटी मेंबर हैं, लेकिन सेवादार की तरह सीमाओं पर काम कर रहे हैं, न कि नेता के रूप में।

हम किसानों के आंदोलन का पूरी तरह से समर्थन करते हैं। मैंने अपने कार्यकर्ताओं को बड़ी संख्या में सीमाओं पर जाने की सलाह दी है ताकि कानून निरस्त हो सकें। वास्तव में, यह न केवल किसानों का आंदोलन है, बल्कि डॉक्टरों, वकीलों, NRI का भी है। संक्षेप में कहें तो हर समुदाय के लोग किसानों का समर्थन कर रहे हैं। सरकार को लोगों की भावनाओं को समझना चाहिए और इन कानूनों को निरस्त करना चाहिए।

सुखबीर के दावों पर किसान नेताओं ने टिप्पणी की है। बीकेयू (उग्राहन) के महासचिव सुखदेव सिंह कोकरीकलां ने कहा कि मेरे लिए यह खबर है कि मृतकों में से 40 SAD कैडर के हैं। कुछ किसान एक विशेष पार्टी के मतदाता हो सकते हैं लेकिन मतदाताओं को कैडर नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा कि ये राजनीतिक दलों की मजबूरी है कि उन्हें अपना वोट बैंक बचाए रखने के लिए प्रदर्शनकारियों के साथ आना पड़ रहा है।

बीकेयू (दकौंडा) के महासचिव और अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के कार्यकारी सदस्य जगमोहन सिंह पटियाला का कहना है-

हम इस तथ्य से सहमत नहीं हैं कि दिल्ली की सीमा पर जान गंवाने वाले 40 किसान SAD कैडर से थे. उनके नेताओं को तो किसानों के भोग समारोह में बोलने की भी अनुमति नहीं है. ऐसे ही मामले में 15 दिसंबर को परिवारों ने SAD के महासचिव प्रेम सिंह चंदूमाजरा को भोग समारोह में बोलने की अनुमति नहीं दी थी.

बहरहाल, SAD नेता सुखबीर सिंह बादल ने यह भी कहा की भाजपा लोगों को बांटने का खेल खेल रही है। काभी आतंकवादी, अर्बन नक्सली कहकर पंजाब की शांति को भंग करने का प्रयास कर रही है। एक विशेष वर्ग और धर्म के लोगों को वोटों की तरह देखकर निशाना बनाते हुए उकसा रहे हैं।  यही कारण है कि मैंने बीजेपी को असली टुकड़े-टुकड़े गैंग कहा है।

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