Home किस्से की पोटली contract farming से फायदा किसको है, किसानों को या निवेशकों को

contract farming से फायदा किसको है, किसानों को या निवेशकों को

केंद्र सरकार द्वारा लाए गए कृषि कानूनों को लेकर गतिरोध जारी है, जिसमें से एक contract farming से संबंधित है। किसान कानून रद्द करने से कम में मानने को तैयार नहीं है, जबकि सरकार तरह-तरह के प्रचार हथकंडों से उन्हें मनाने की कोशिश कर रही है। तीन कानूनों में से एक contract farming को लेकर किसानों का यह कहना है कि इससे उनकी ज़मीन छिन जाने का जोखिम है। वे अपनी ही ज़मीन में मज़दूर बनकर रह जाएंगे।

नए कानून में प्रावधान किया है कि विवादों का निपटारा डीएम या एसडीएम करेंगे, इसमें अदालत जाने का विकल्प नहीं है। ऐसी स्थिति में किसानों को डर है कि स्थानीय प्रशासन अगर कंपनियों का साथ दें तो किसान कहाँ जाएगा। जबकि सरकार का तर्क है कि यह किसानों को उनकी फसलों की कीमतों में उतार-चढ़ाव से बचाएगी। साथ ही नई टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से कृषि उन्नत हो जाएगी। सरकार और किसानों के बीच गतिरोध का अंत कैसे होगा या इस विवाद का क्या हल निकलेगा? इन सवालों के जवाब पर अनिश्चितता बनी हुई है।

contract farming का मुख्य पहलू

contract farming के पक्ष-विपक्ष को लेकर मशहूर मीडिया हाउस बीबीसी ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। इस रिपोर्ट में देश में पहले से चल रहे contract farming के आधार पर अध्ययन किया गया है। contract farming के पक्षधर ये कहते हैं कि बुआई या रोपाई के वक्त ही फसलों की कीमत तय हो जाने से यह तो तय हो जाता है कि फसल की कीमत क्या मिलेगी। खरीदार भी तय हो जाते हैं, इससे किसानों का जोखिम कम हो जाता है। हालांकि कीड़ों के हमले या फिर जीव-जनित या प्राकृतिक आपदा को लेकर किसान पर जोखिम बना ही रहता है। इस पर किसानों का कहना है कि पारंपरिक ब्रीडिंग और एडवांस बायोटेक्नोलॉजी के जरिए जीन सुधार और जीन एडिटिंग फसलों को रोग प्रतिरोधी बनान संभव है।

अगर कंपनियों के नज़रिये से देखा जाए तो वे कभी नहीं चाहेंगे कि फसलों को नुकसान पहुँचे, फसलों की क्वालिटी अच्छी मिले और नुकसान न हो। लेकिन यह तय है कि ऐसी परिस्थिति में ज्यादा नुकसान किसानों को ही उठाना पड़ता है। हरित क्रांति के ज़रिये किसानों के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था की गई है, यानि किसानों को कम से कम इतनी कीमत फसलों की मिलेगी ही।

फायदा किसानों को या कंपनियों को

यह कहना आसान नहीं है कि फायदा किसानों को ज़्यादा है या कंपनियों को, इसमें दोनों पक्षों की स्थिति अलग-अलग होती है।

पेप्सिको ने पंजाब में अपने प्रोसेसिंग प्लांट के लिये वांछित क्वालिटी के टमाटरों के उत्पादन के लिये स्वयं बीज-खाद आदि के अलावा फसलों की सुरक्षा की व्यवस्था की थी। महँगे हाइब्रिड बीजों का ज्यादा से ज्यादा अंकुरण हो इसकी व्यवस्था की गई थी। अर्थात कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में गुणवत्तापूर्ण टमाटरों के उत्पादन की ज़िम्मेदारी पेप्सिको ने भी उठाई थी। इसका फायदा टमाटर उत्पादक किसानों को भी हुआ।

इसी तरह जलगांव भी contract farming का फायदा उठाकर महाराष्ट्र का सबसे बड़ा केला उत्पादक जिला बना और जलगांव की बदौलत केले के उत्पादन में महाराष्ट्र देश का तीसरा राज्य बना। इसी प्रकार आईटीसी के साथ मिलकर राजस्थान के गेहूँ उत्पादक किसानों को लाभ हुआ।

जिस तरह हरित क्रान्ति के ज़रिये सरकार ने किसानों की फसलों की खरीद गारंटी सुनिश्चित की है, contract farming भी उसी तरह है, जिसमें फसलों के बिकना सुनिश्चित होता है। यहाँ एक अंतर बस उद्देश्य का है, जहाँ सरकार का लक्ष्य जनकल्याण के साथ-साथ राजनीतिक फायदा होता है, जबकि कंपनी का उद्देश्य विशुद्ध रूप से मुनाफ़ा कमाना। यही अंतर किसानों के फायदे में सेंध मार सकता है, contract farming का विरोध करने वालों का डर भी यही है।

contract farming अमेरिका का नाकाम मॉडल

कृषि मामलों के जानकार देवेंद्र शर्मा के अनसार, यह कहना गलत है कि contract farming से फ़सल की पैदावार में इज़ाफा होगा और क्वालिटी बेहतर होगी। वो इस मॉडल को अमेरिका की नकल मानते हैं। उनका तर्क है कि यदि यह फायदेमंद होता तो अमेरिका के किसान दुःखी नहीं होते। देश के किसान भी कृषि के इस तरीके की तारीफें कर रहे होते। कृषि में अनुबंध से अगर कहीँ-कहीँ फायदा हुआ है तो ज़रूरी नहीं कि पूरे देश में यह फायदेमंद होता।

सरकारी समर्थन मूल्य की तरह contract farming में भी फसलों की कीमतें लिखी होती हैं, लेकिन इसे गारंटी नहीं माना जा सकता। देवेंद्र शर्मा कहते हैं कि बिना एमएसपी के किसानों को किसी तरह की गारंटी नहीं मिल सकती।

“मूंग की दाल का एमएसपी 72 रुपये प्रति किलो है, मार्केट में 50 रुपये है, आप कॉन्ट्रैक्ट 52 रुपये पर कर लेंगे और कहेंगे कि ये तो 2 रुपये ज़्यादा है, लेकिन कीमत 72 रुपये मिलनी चाहिए थी।” देवेंद्र शर्मा(कृषि मामलों के विशेषज्ञ)

एमएसपी की व्यवस्था कंपनियों के अनुकूल नहीं

उपरोक्त वक्तव्य को ध्यान से पढ़ने पर समझ में आता है कि मार्केट से ज्यादा कीमत मिलने के बावजूद मूंग की कीमत एमएसपी से बीस रूपये कम मिल रही है। यही कारण है कि देवेंद्र शर्मा यह मानते हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य का प्रावधान यदि कानून में आ गया तो कंपनियाँ कृषि से हाथ खींच लेंगी। इसलिये किसान भी न्यूनतम समर्थन मूल्य का प्रावधान कानून में चाहते थे।

किसान और सरकार के बीच गतिरोध का कारण काफी हद तक इससे समझा जा सकता है। यदि सरकार कानून में न्यूनतम समर्थन मूल्य का प्रावधान कर दे तो कृषि में निजी निवेश मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि कंपनियाँ निवेश में हिचकिचाएंगी। दूसरी तरफ यह प्रावधान न किया जाए तो किसानों के शोषण का मार्ग खुल जाएगा।

यह भी पढ़ें – भारतीय किसान यूनियन से चंदे का विवरण मांगा जाना क्या उन्हें तोड़ने की कोशिश है

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